वह अमेरिका की पहली

वह अमेरिका की पहली

सबक सीखा

एक दिन, एक बहुत धनी परिवार का पिता अपने बेटे को देश की यात्रा पर ले गया और उसे यह दिखाने के उद्देश्य से लाया कि गरीब लोग कैसे रहते हैं। उन्होंने एक बहुत गरीब परिवार माना जाएगा, इस खेत पर कुछ दिन और रात बिताई।




अपनी यात्रा से लौटने पर, पिता ने अपने बेटे से पूछा, "यात्रा कैसी थी?"
"यह बहुत अच्छा था, पिताजी।"
"क्या आपने देखा कि गरीब लोग कैसे रहते हैं?" पिता ने पूछा।
"अरे हाँ," बेटे ने कहा।
"तो, मुझे बताओ, तुमने यात्रा से क्या सीखा?" पिता ने पूछा।
बेटे ने जवाब दिया: “मैंने देखा कि हमारे पास एक कुत्ता है और उनके पास चार हैं। हमारे पास एक पूल है जो हमारे बगीचे के मध्य तक पहुंचता है और उनके पास एक नाला है जिसका कोई अंत नहीं है। हमने अपने बगीचे में लालटेन आयात किया है और उनके पास रात में तारे हैं। हमारा आँगन सामने वाले यार्ड में पहुँच जाता है और उनके पास पूरा क्षितिज है।
“हमारे पास रहने के लिए जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा है और उनके पास ऐसे खेत हैं जो हमारी दृष्टि से परे हैं।

“हमारे पास ऐसे सेवक हैं जो हमारी सेवा करते हैं, लेकिन वे दूसरों की सेवा करते हैं। हम अपना भोजन खरीदते हैं, लेकिन वे अपना विकास करते हैं।
"हमारी रक्षा के लिए हमारी संपत्ति के चारों ओर दीवारें हैं, उनकी रक्षा के लिए उनके मित्र हैं।"
लड़के के पिता अवाक थे।
तब उनके बेटे ने कहा, "पिताजी को धन्यवाद देने के लिए कि हम कितने गरीब हैं।"

Moral: लव, यूनिटी, केयर, सैटिस्फैक्शन किसी भी आराम के पैसे से ज्यादा अमीर है।
तपस्विनी बिल्ली

तपस्विनी बिल्ली

तपस्विनी बिल्ली



एक वन में एक पेड़ की खोह में एक चकोर रहता था। उसी पेड़ के आस-पास कई पेड़ और थे, जिन पर फल व बीज उगते थे। उन फलों और बीजों से पेट भरकर चकोर मस्त पड़ा रहता। इसी प्रकार कई वर्ष बीत गए।

एक दिन उड़ते-उड़ते एक और चकोर सांस लेने के लिए उस पेड़ की टहनी पर बैठा। दोनों में बातें हुईं। दूसरे चकोर को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि वह केवल वह केवल पेड़ों के फल व बीज चुगकर जीवन गुजार रहा है।

दूसरे ने उसे बताया, 'भई, दुनिया में खाने के लिए केवल फल और बीज ही नहीं होते और भी कई स्वादिष्ट चीजें हैं। उन्हें भी खाना चाहिए। खेतों में उगने वाले अनाज तो बेजोड़ होते हैं। कभी अपने खाने का स्वाद बदलकर तो देखो।'

दूसरे चकोर के उड़ने के बाद वह चकोर सोच में पड़ गया। उसने फैसला किया कि कल ही वह दूर नजर आने वाले खेतों की ओर जाएगा और उस अनाज नाम की चीज का स्वाद चखकर देखेगा।

दूसरे दिन चकोर उड़कर एक खेत के पास उतरा। खेत में धान की फसल उगी थी। चकोर ने कोंपलें खाईं। उसे वे स्वादिष्ट लगीं। उस दिन के भोजन में उसे इतना आनंद आया कि खाकर तृप्त होकर वहीं आखें मूंदकर सो गया। इसके बाद भी वह वहीं पड़ा रहा। रोज खाता-पीता और सो जाता। छः-सात दिन बाद उसे सुध आई कि घर लौटना चाहिए।

इस बीच एक खरगोश घर की तलाश में घूम रहा था। उस इलाके में जमीन के नीचे पानी भरने के कारण उसका बिल नष्ट हो गया था। वह उसी चकोर वाले पेड़ के पास आया और उसे खाली पाकर उसने उस पर अधिकार जमा लिया और वहां रहने लगा। जब चकोर वापस लौटा तो उसने पाया कि उसके घर पर तो किसी और का कब्जा हो गया हैं। चकोर क्रोधित होकर बोला, 'ऐ भाई, तू कौन हैं और मेरे घर में क्या कर रहा है?'

खरगोश ने दांत दिखाकर कहा, 'मैं इस घर का मालिक हूं। मैं सात दिन से यहां रह रहा हूं, यह घर मेरा है।'

चकोर गुस्से से फट पड़ा, 'सात दिन! भाई, मैं इस खोह में कई वर्षों से रह रहा हूं। किसी भी आस-पास के पंछी या चौपाए से पूछ लो।'

खरगोश चकोर की बात काटता हुआ बोला, 'सीधी-सी बात है। मैं यहां आया। यह खोह खाली पड़ी थी और मैं यहां बस गया, मैं क्यों अब पड़ोसियों से पूछता फिरूं?'

चकोर गुस्से में बोला, 'वाह! कोई घर खाली मिले तो इसका यह मतलब हुआ कि उसमें कोई नहीं रहता? मैं आखिरी बार कह रहा हूं कि शराफत से मेरा घर खाली कर दे वर्ना…।'

खरगोश ने भी उसे ललकारा, 'वर्ना तू क्या कर लेगा? यह घर मेरा है। तुझे जो करना है, कर ले।'

चकोर सहम गया। वह मदद और न्याय की फरियाद लेकर पड़ोसी जानवरों के पास गया सबने दिखावे की हूं-हूं की, परंतु कोई सहायता करने सामने नहीं आया।

एक बूढ़े पड़ोसी ने कहा- 'ज्यादा झगड़ा बढ़ाना ठीक नहीं होगा। तुम दोनों आपस में कोई समझौता कर लो।' पर समझौते की कोई सूरत नजर नहीं आ रही थी, क्योंकि खरगोश किसी शर्त पर खोह छोड़ने को तैयार नहीं था। अंत में लोमड़ी ने उन्हें सलाह दी, 'तुम दोनों किसी ज्ञानी-ध्यानी को पंच बनाकर अपने झगड़े का फैसला उससे करवाओ।'

दोनों को यह सुझाव पसंद आया। अब दोनों पंच की तलाश में इधर-उधर घूमने लगे। इसी प्रकार घूमते-घूमते वे दोनों एक दिन गंगा किनारे आ निकले। वहां उन्हें जप-तप में मग्न एक बिल्ली नजर आई। बिल्ली के माथे पर तिलक था। गले में जनेऊ और हाथ में माला लिए मृगछाल पर बैठी वह पूरी तपस्विनी लग रही थी। उसे देखकर चकोर व खरगोश खुशी से उछल पड़े। उन्हें भला इससे अच्छा ज्ञानी-ध्यानी कहां मिलेगा? खरगोश ने कहा, 'चकोर, क्यों न हम इससे अपने झगड़े का फैसला करवाएं?'

चकोर पर भी बिल्ली का अच्छा प्रभाव पड़ा था, पर वह जरा घबराया हुआ था। चकोर बोला- 'मुझे कोई आपत्ति नहीं है, पर हमें जरा सावधान रहना चाहिए।' खरगोश पर तो बिल्ली का जादू चल गया था। उसने कहा- 'अरे नहीं! देखते नहीं हो, यह बिल्ली सांसारिक मोह-माया त्यागकर तपस्विनी बन गई हैं।'

सच्चाई तो यह थी कि बिल्ली उन जैसे मूर्ख जीवों को फांसने के लिए ही भक्ति का नाटक कर रही थी। फिर चकोर और खरगोश पर और प्रभाव डालने के लिए वह जोर-जोर से मंत्र पढ़ने लगी। खरगोश और चकोर ने उसके निकट आकर हाथ जोड़कर जयकारा लगाया, 'बिल्ली माता को प्रणाम।'

बिल्ली ने मुस्कुराते हुए धीरे से अपनी आंखें खोलीं और आशीर्वाद दिया, 'आयुष्मान भव, तुम दोनों के चेहरों पर चिंता की लकीरें हैं। क्या कष्ट हैं तुम्हें बच्चों?'

चकोर ने विनती की, 'माता हम दोनों के बीच एक झगड़ा है। हम चाहते हैं कि आप उसका फैसला करें।'

बिल्ली ने पलकें झपकाईं, 'हरे राम, हरे राम! तुम्हें झगड़ना नहीं चाहिए। प्रेम और शांति से रहो।' उसने उपदेश दिया और बोली, 'खैर, बताओ, तुम्हारा झगड़ा क्या है?'

चकोर ने मामला बताया। खरगोश ने अपनी बात कहने के लिए मुंह खोला ही था कि बिल्ली ने पंजा उठाकर रोका और बोली, 'बच्चों, मैं काफी बूढी हूं ठीक से सुनाई नहीं देता। आंखें भी कमजोर हैं इसलिए तुम दोनों मेरे निकट आकर मेरे कान में जोर से अपनी-अपनी बात कहो ताकि मैं झगड़े का कारण जान सकूं और तुम दोनों को न्याय दे सकूं। जय सियाराम।'

वे दोनों भगतिन बिल्ली के बिलकुल निकट आ गए ताकि उसके कानों में अपनी-अपनी बात कह सके। बिल्ली को इसी अवसर की तलाश थी उसने ‘म्याऊं’ की आवाज लगाई और एक ही झपट्टे में खरगोश और चकोर का काम तमाम कर दिया और आराम से उन्हें खाने लगी। 
अफलातून की सीख

अफलातून की सीख

अफलातून की सीख




यूनानी दार्शनिक अफलातून (Aflatoon ) के पास हर दिन कई विद्वानों का जमावड़ा लगा रहता था । सभी लोग उनसे कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त करके ही जाया करते थे । लेकिन स्वयं अफलातून (Aflatoon ) खुद को कभी ज्ञानी नहीं मानते थे क्योंकि उनका मानना था कि इन्सान कभी भी ज्ञानी केसे हो सकता है जबकि हमेशा वो सीखता ही रहता है ।

एक दिन उनके एक मित्र ने उनसे कहा कि ” आपके पास दुनियाभर के विद्वान आपसे ज्ञान लेने आते है और वो लोग आपसे बाते करते हुए अपना जीवन धन्य समझते है लेकिन भी आपकी एक बात मुझे आज तक समझ नहीं आई ” इस पर अफलातून बोले तुम्हे किस बात की शंका है जाहिर तो करो जो पता चले ।

मित्र ने कहा आप खुद बड़े विद्वान और ज्ञानी है लेकिन फिर भी मेने देखा है आप हर समय दूसरों से शिक्षा लेने को तत्पर रहते है । वह भी बड़े उत्साह और उमंग के साथ । इस से बड़ी बात है कि आपको साधारण व्यक्ति से भी सीखने में कोई परेशानी नहीं होती आप उस से भी सीखने को तत्पर रहते है । आपको भला सीखने को जरुरत क्या है कंही आप लोगो को खुश करने के लिए तो उनसे सीखने का दिखावा नहीं करते है ?

अफलातून (Aflatoon ) जोर जोर से हंसने लगे तो मित्र ने पूछा ऐसा क्यों तो अफलातून ने जवाब दिया कि इन्सान अपनी पूरी जिन्दगी में भी कुछ पूरा नहीं सीख सकता हमेशा कुछ न कुछ अधूरा ही रहता है और फिर हर इन्सान के पास कुछ न कुछ ऐसा जरूर है जो दूसरों के पास नहीं है । इसलिए हर किसी को हर किसी से सीखते रहना चाहिए । और फिर हर बात और अनुभव किताबों में तो नहीं मिलते क्योंकि बहुत कुछ ऐसा है जो लिखा नहीं गया है जबकि वास्तविकता में रहकर और लोगो से सीखते रहने की आदत आपको पूरा नहीं पूर्णता के करीब जरुर ले जाती है । यही जिन्दगी का सार है ।
संत लल्लेश्वरी की समदर्शिता

संत लल्लेश्वरी की समदर्शिता

  • संत लल्लेश्वरी की समदर्शिता




कश्मीर में लल्लेश्वरी नामक एक संत थी । उनका विवाह बारह वर्ष की अवस्था में हुआ था, किंतु ससुराल में उनके प्रति दुर्व्यवहार होने से उन्होंने घर त्याग दिया और सेदवायु नामक एक संत से दीक्षा ले ली।

भगवद्-भजन में वे इतनी लीन रहने लगीं कि लोक-लज्जा का भी उन्हें ख्याल न रहता। मीरा के समान मतवाली हो वे भजन करती हुई जब सड़क से गुजरतीं, तो लोग उनका उपहास उड़ाते।

एक बार वे भजन करती हुई मंदिर जा रही थीं कि बच्चे उनके पीछे पड़ गए और उन्हें चिढ़ाने लगे। इस पर एक वस्त्र-व्यापारी ने उन्हें डांटा और भगा दिया। वे बच्चे जब भाग गए तो व्यापारी विजयी मुस्कान से लल्लेश्वरी की ओर देखने लगा। उसकी भंगिमा बता रही थीं कि उसने जैसे संत की बड़ी सेवा की है।

लल्लेश्वरी ने व्यापारी की ओर आशीर्वादात्मक मुद्रा में हाथ उठाया। उसने समझा कि संत प्रसन्न हैं, वह संत के पास गया और उनकी वंदना की। लल्लेश्वरी ने व्यापारी से एक कपड़ा मांगा और उसके दो बराबर-बराबर टुकड़े करने को कहा।

व्यापारी द्वारा वैसा करने पर उन टुकड़ों को अपने दोनों कंधों पर डालकर वे आगे बढ़ीं। रास्ते में जब कोई उनका अभिवादन करता या हंसी उड़ाता, तो वे उन टुकड़ों में एक-एक गठान बांधतीं।

मंदिर से लौटने पर उन्होंने वे टुकड़े व्यापारी को वापस करते हुए उनका वजन करने को कहा। वजन करने पर उनका वजन बराबर-बराबर मिला।

तब लल्लेश्वरी बोलीं, 'प्रशंसा या निंदा का हमें बिलकुल ख्याल नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये दोनों एक-दूसरे को संतुलित करती रहती हैं। इसलिए हमें सबको समान दृष्टि से देखना चाहिए और समान भाव से ग्रहण करना चाहिए।'

संत ललेश्वरी अपने (लल, लला, ललारिफा, ललदेवी आदि) नामों से विख्यात हैं। इस कवयित्री को कश्मीरी साहित्य में वही स्थान प्राप्त है जो हिन्दी में कबीर को है।
चालाकी का फल

चालाकी का फल

चालाकी का फल



एक थी बुढ़िया, बेहद बूढ़ी पूरे नब्बे साल की। एक तो बेचारी को ठीक से दिखाई नहीं पड़ता था ऊपर से उसकी मुर्गियाँ चराने वाली लड़की नौकरी छोड़ कर भाग गयी।

बेचारी बुढ़िया! सुबह मुर्गियों को चराने के लिये खोलती तो वे पंख फड़फड़ाती हुई सारी की सारी बुढिया के घर की चारदीवारी फाँद कर अड़ोस पड़ोस के घरों में भाग जातीं और 'कों कों कुड़कुड़' करती हुई सारे मोहल्ले में हल्ला मचाती हुई घूमतीं। कभी वे पड़ोसियों की सब्जियाँ खा जातीं तो कभी पड़ोसी काट कर उन्हीं की सब्जी बना डालते। दोनों ही हालतों में नुकसान बेचारी बुढ़िया का होता। जिसकी सब्जी बरबाद होती वह बुढ़िया को भला बुरा कहता और जिसके घर में मुर्गी पकती उससे बुढ़िया की हमेशा की दुश्मनी हो जाती।

हार कर बुढ़िया ने सोचा कि बिना नौकर के मुर्गियाँ पालना उसकी जैसी कमज़ोर बुढ़िया के बस की बात नहीं। भला वो कहाँ तक डंडा लेकर एक एक मुर्गी हाँकती फिरे? ज़रा सा काम करने में ही तो उसका दम फूल जाता था। और बुढ़िया निकल पड़ी लाठी टेकती नौकर की तलाश में।

पहले तो उसने अपनी पुरानी मुर्गियाँ चराने वाली लड़की को ढूँढा। लेकिन उसका कहीं पता नहीं लगा। यहाँ तक कि उसके माँ बाप को भी नहीं मालूम था कि लड़की आखिर गयी तो गयी कहाँ? "नालायक और दुष्ट लड़की! कहीं ऐसे भी भागा जाता है? न अता न पता सबको परेशान कर के रख दिया।" बुढ़िया बड़बड़ायी और आगे बढ़ गयी।

थोड़ी दूर पर एक भालू ने बुढ़िया को बड़बड़ाते हुए सुना तो वह घूम कर सड़क पर आ गया और बुढ़िया को रोक कर बोला, " गु र्र र , बुढ़िया नानी नमस्कार! आज सुबह सुबह कहाँ जा रही हो? सुना है तुम्हारी मुर्गियाँ चराने वाली लड़की नौकरी छोड़ कर भाग गयी है। न हो तो मुझे ही नौकर रख लो। खूब देखभाल करूँगा तुम्हारी मुर्गियों की।"

"अरे हट्टो, तुम भी क्या बात करते हो? बुढ़िया ने खिसिया कर उत्तर दिया, " एक तो निरे काले मोटे बदसूरत हो मुर्गियाँ तो तुम्हारी सूरत देखते ही भाग खड़ी होंगी। फिर तुम्हारी बेसुरी आवाज़ उनके कानों में पड़ी तो वे मुड़कर दड़बे की ओर आएँगी भी नहीं। एक तो मुर्गियों के कारण मुहल्ले भर से मेरी दुश्मनी हो गयी है, दूसरा तुम्हारे जैसा जंगली जानवर और पाल लूँ तो मेरा जीना भी मुश्किल हो जाए। छोड़ो मेरा रास्ता मैं खुद ही ढूँढ लूँगी अपने काम की नौकरानी।"

बुढ़िया आगे बढ़ी तो थोड़ी ही दूर पर एक सियार मिला और बोला, "हुआँ हुआँ राम राम बुढ़िया नानी किसे खोज रही हो? बुढ़िया खिसिया कर बोली, अरे खोज रहीं हूँ एक भली सी नौकरानी जो मेरी मुर्गियों की देखभाल कर सके। देखो भला मेरी पुरानी नौकरानी इतनी दुष्ट छोरी निकली कि बिना बताए कहीं भाग गयी अब मैं मुर्गियों की देखभाल कैसे करूँ? कोई कायदे की लड़की बताओ जो सौ तक गिनती गिन सके ताकि मेरी सौ मुर्गियों को गिन कर दड़बे में बन्द कर सकें।"

यह सुन कर सियार बोला, "हुआँ हुआँ, बुढ़िया नानी ये कौन सी बड़ी बात है? चलो अभी मैं तुम्हें एक लड़की से मिलवाता हूँ। मेरे पड़ोस में ही रहती है। रोज़ जंगल के स्कूल में पढ़ने जाती है इस लिये सौ तक गिनती उसे जरूर आती होगी। अकल भी उसकी खूब अच्छी है। शेर की मौसी है वो, आओ तुम्हें मिलवा ही दूँ उससे।

बुढ़िया लड़की की तारीफ सुन कर बड़ी खुश होकर बोली, "जुग जुग जियो बेटा, जल्दी बुलाओ उसे कामकाज समझा दूँ। अब मेरा सारा झंझट दूर हो जाएगा। लड़की मुर्गियों की देखभाल करेगी और मैं आराम से बैठकर मक्खन बिलोया करूँगी।"

सियार भाग कर गया और अपने पड़ोस में रहने वाली चालाक पूसी बिल्ली को साथ लेकर लौटा। पूसी बिल्ली बुढ़िया को देखते ही बोली, "म्याऊँ, बुढ़िया नानी नमस्ते। मैं कैसी रहूँगी तुम्हारी नौकरानी के काम के लिये?" नौकरानी के लिये लड़की जगह बिल्ली को देखकर बुढ़िया चौंक गयी। बिगड़ कर बोली, "हे भगवान कहीं जानवर भी घरों में नौकर हुआ करते हैं? तुम्हें तो अपना काम भी सलीके से करना नहीं आता होगा। तुम मेरा काम क्या करोगी?"

लेकिन पूसी बिल्ली बड़ी चालाक थी। आवाज को मीठी बना कर मुस्कुरा कर बोली, "अरे बुढ़िया नानी तुम तो बेकार ही परेशान होती हो। कोई खाना पकाने का काम तो है नहीं जो मैं न कर सकू। आखिर मुर्गियों की ही देखभाल करनी है न? वो तो मैं खूब अच्छी तरह कर लेती हूँ। मेरी माँ ने तो खुद ही मुर्गियाँ पाल रखी हैं। पूरी सौ हैं। गिनकर मैं ही चराती हूँ और मैं ही गिनकर बन्द करती हूँ। विश्वास न हो तो मेरे घर चलकर देख लो।"

एक तो पूसी बिल्ली बड़ी अच्छी तरह बात कर रही थी और दूसरे बुढ़िया काफी थक भी गयी थी इसलिये उसने ज्यादा बहस नहीं की और पूसी बिल्ली को नौकरी पर रख लिया।

पूसी बिल्ली ने पहले दिन मुर्गियों को दड़बे में से निकाला और खूब भाग दौड़ कर पड़ोस में जाने से रोका। बुढ़िया पूसी बिल्ली की इस भाग-दौड़ से संतुष्ट होकर घर के भीतर आराम करने चली गयी। कई दिनों से दौड़ते भागते बेचारी काफी थक गयी थी तो उसे नींद भी आ गयी।

इधर पूसी बिल्ली ने मौका देखकर पहले ही दिन छे मुर्गियों को मारा और चट कर गयी। बुढ़िया जब शाम को जागी तो उसे पूसी की इस हरकत का कुछ भी पता न लगा। एक तो उसे ठीक से दिखाई नहीं देता था और उसे सौ तक गिनती भी नहीं आती थी। फिर भला वह इतनी चालाक पूसी बिल्ली की शरारत कैसे जान पाती?

अपनी मीठी मीठी बातोंसे बुढ़िया को खुश रखती और आराम से मुर्गियाँ चट करती जाती। पड़ोसियों से अब बुढ़िया की लड़ाई नहीं होती थी क्योंकि मुर्गियाँ अब उनके आहाते में घुस कर शोरगुल नहीं करती थीं। बुढ़िया को पूसी बिल्ली पर इतना विश्वास हो गया कि उसने मुर्गियों के दड़बे की तरफ जाना छोड़ दिया।

धीरे धीरे एक दिन ऐसा आया जब दड़बे में बीस पच्चीस मुर्गियाँ ही बचीं। उसी समय बुढ़िया भी टहलती हुई उधर ही आ निकली। इतनी क़म मुर्गियाँ देखकर उसने पूसी बिल्ली से पूछा, "क्यों री पूसी, बाकी मुर्गियों को तूने चरने के लिये कहाँ भेज दिया?" पूसी बिल्ली ने झट से बात बनाई, " अरे और कहाँ भेजँूगी बुढ़िया नानी। सब पहाड़ के ऊपर चली गयी हैं। मैंने बहुत बुलाया लेकिन वे इतनी शरारती हैं कि वापस आती ही नहीं।"

"ओफ् ओफ् ! ये शरारती मुर्गियाँ।" बुढ़िया का बड़बड़ाना फिर शुरू हो गया, "अभी जाकर देखती हूँ कि ये इतनी ढीठ कैसे हो गयी हैं? पहाड़ के ऊपर खुले में घूम रही हैं। कहीं कोई शेर या भेड़िया आ ले गया तो बस!"

ऊपर पहुँच कर बुढ़िया को मुर्गियाँ तो नहीं मिलीं। मिलीं सिर्फ उनकी हडि्डयाँ और पंखों का ढ़ेर! बुढ़िया को समझते देर न लगी कि यह सारी करतूत पूसी बिल्ली की है। वो तेजी से नीचे घर की ओर लौटी।

इधर पूसी बिल्ली ने सोचा कि बुढ़िया तो पहाड़ पर गयी अब वहाँ सिर पकड़ कर रोएगी जल्दी आएगी नहीं। तब तक क्यों न मैं बची-बचाई मुर्गियाँ भी चट कर लूँ? यह सोच कर उसने बाकी मुर्गियों को भी मार डाला। अभी वह बैठी उन्हें खा ही रही थी कि बुढ़िया वापस लौट आई।

पूसी बिल्ली को मुर्गियाँ खाते देखकर वह गुस्से से आग बबूला हो गयी और उसने पास पड़ी कोयलों की टोकरी उठा कर पूसी के सिर पर दे मारी। पूसी बिल्ली को चोट तो लगी ही, उसका चमकीला सफेद रंग भी काला हो गया। अपनी बदसूरती को देखकर वह रोने लगी।

आज भी लोग इस घटना को नही भूले हैं और रोती हुई काली बिल्ली को डंडा लेकर भगाते हैं। चालाकी का उपयोग बुरे कामों में करने वालों को पूसी बिल्ली जैसा फल भोगना पड़ता है।
चतुर बिल्ली

चतुर बिल्ली

चतुर बिल्ली



एक चिड़ा पेड़ पर घोंसला बनाकर मजे से रहता था। एक दिन वह दाना पानी के चक्कर में अच्छी फसल वाले खेत में पहुँच गया। वहाँ खाने पीने की मौज से बड़ा ही

खुश हुआ। उस खुशी में रात को वह घर आना भी भूल गया और उसके दिन मजे में वही बीतने लगे।

इधर शाम को एक खरगोश उस पेड़ के पास आया जहाँ चिड्डे का घोंसला था। पेड़ जरा भी ऊँचा नहीं था। इसलिए खरगोश ने उस घोंसलें में झाँक कर देखा तो पता चला कि यह घोंसला खाली पड़ा है। घोंसला अच्छा खासा बड़ा था इतना कि वह उसमें खरगोश आराम से रह सकता था। उसे यह बना बनाया घोंसला पसन्द आ गया और उसने यहीं रहने का फैसला कर लिया।

कुछ दिनों बाद वह चिड्डा खा खा कर मोटा ताजा बन कर अपने घोंसलें की याद आने पर वापस लौटा। उसने देखा कि घोंसलें में खरगोश आराम से बैठा हुआ है। उसे बड़ा गुस्सा आया, उसने खरगोश से कहा, "चोर कहीं का, मैं नहीं था तो मेरे घर में घुस गये हो? चलो निकलो मेरे घर से, जरा भी शरम नहीं आयी मेरे घर में रहते हुए?"

खरगोश शान्ति से जवाब देने लगा, "कहाँ का तुम्हारा घर? कौन सा तुम्हारा घर? यह तो मेरा घर है। पागल हो गये हो तुम। अरे! कुआँ, तालाब या पेड़ एक बार छोड़कर कोई जाता हैं तो अपना हक भी गवाँ देता हैं। यहाँ तो जब तक हम हैं, वह अपना घर है। बाद में तो उसमें कोई भी रह सकता है। अब यह घर मेरा है। बेकार में मुझे तंग मत करो।"

यह बात सुनकर चिड्डा कहने लगा, " ऐसे बहस करने से कुछ हासिल नहीं होनेवाला। किसी धर्मपण्डित के पास चलते हैं। वह जिसके हक में फैसला सुनायेगा उसे घर मिल जायेगा।

उस पेड़ के पास से एक नदी बहती थी। वहाँ पर एक बड़ी सी बिल्ली बैठी थी। वह कुछ धर्मपाठ करती नज़र आ रही थी। वैसे तो यह बिल्ली इन दोनों की जन्मजात शत्रु है लेकिन वहाँ और कोई भी नहीं था इसलिए उन दोनों ने उसके पास जाना और उससे न्याय लेना ही उचित समझा। सावधानी बरतते हुए बिल्ली के पास जा कर उन्होंने अपनी समस्या बतायी।

उन्होंने कहा, "हमने अपनी उलझन तो बता दी, अब इसका हल क्या है? इसका जबाब आपसे सुनना चाहते हैं। जो भी सही होगा उसे वह घोंसला मिल जायेगा और जो झूठा होगा उसे आप खा लें।"

"अरे रे !! यह तुम कैसी बातें कर रहे हो, हिंसा जैसा पाप नहीं इस दुनिया में। दूसरों को मारने वाला खुद नरक में जाता है। मैं तुम्हें न्याय देने में तो मदद करूँगी लेकिन झूठे को खाने की बात है तो वह मुझसे नहीं हो पायेगा। मैं एक बात तुम लोगों को कानों में कहना चाहती हूँ, जरा मेरे करीब आओ तो!!"

खरगोश और चिड़ा खुश हो गये कि अब फैसला हो कर रहेगा। और उसके बिलकुल करीब गये। फिर क्या? करीब आये खरगोश को पंजे में पकड़ कर मुँह से चिड्डे को नोच लिया। दोनों का काम तमाम कर दिया। अपने शत्रु को पहचानते हुए भी उस पर विश्वास करने से खरगोश और चिड्डे को अपनी जानें गवाँनीं पड़ीं।

सच है, शत्रु से संभलकर और हो सके तो चार हाथ दूर ही रहने में भलाई होती है। 
गोपी लौट आया

गोपी लौट आया

बीरबल खिचड़ी

ठंड के दिनों में अकबर और बीरबल ने झील के किनारे सैर की। एक विचार बीरबल के पास आया कि एक आदमी पैसे के लिए कुछ भी करेगा। उन्होंने अकबर के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त किया। अकबर ने फिर अपनी उंगली झील में डाल दी और उसे तुरंत हटा दिया क्योंकि वह ठंड से कांप रहा था। अकबर ने कहा "मुझे

 नहीं लगता कि एक आदमी पैसे के लिए इस झील के ठंडे पानी में पूरी रात बिताएगा।" बीरबल ने जवाब दिया "मुझे यकीन है कि मैं ऐसे व्यक्ति को ढूंढ सकता हूं।" अकबर ने बीरबल को इस तरह के व्यक्ति को खोजने में चुनौती दी। उसने कहा कि वह उस व्यक्ति को एक हजार सोने के सिक्के देगा।

बीरबल ने दूर-दूर तक खोजबीन की, जब तक कि उन्हें एक गरीब आदमी नहीं मिला, जो चुनौती स्वीकार करने के लिए पर्याप्त हताश था। गरीब आदमी ने झील में प्रवेश किया और अकबर के पास उसके पास तैनात गार्ड थे जो यह सुनिश्चित करने के लिए कि उसने वास्तव में वादा किया था। अगली सुबह गार्ड्स गरीब आदमी को अकबर के पास ले गए। अकबर ने गरीब आदमी से पूछा कि क्या उसने वास्तव में झील में रात बिताई है। गरीब आदमी ने जवाब दिया कि उसके पास है। अकबर ने उस गरीब आदमी से पूछा कि वह झील में रात बिताने में कैसे कामयाब रहा।

गरीब आदमी ने जवाब दिया कि पास में एक स्ट्रीट लैंप था और उसने अपना ध्यान दीपक पर और ठंड से दूर रखा। अकबर ने तब कहा कि कोई इनाम नहीं होगा क्योंकि गरीब आदमी स्ट्रीट लैंप की गर्मी से झील में बच गया था। गरीब आदमी मदद के लिए बीरबल के पास गया।

अगले दिन, बीरबल अदालत नहीं गए। राजा आश्चर्यचकित था कि वह कहाँ था, उसने अपने घर पर एक दूत भेजा। दूत यह कहकर वापस आ गया कि बीरबल एक बार उसकी खिचड़ी (चावल) पकाएगा। राजा ने घंटों इंतजार किया लेकिन बीरबल नहीं आए। अंत में राजा ने बीरबल के घर जाकर देखने का फैसला किया कि वह क्या कर रहा है।

उसने बीरबल को कुछ जलती हुई टहनियों के पास फर्श पर बैठा पाया और खिचड़ी (चावल) से भरा एक कटोरा आग से पाँच फीट ऊपर लटका दिया। राजा और उसके परिचारक मदद नहीं कर सकते, लेकिन हंस सकते हैं।

अकबर ने तब बीरबल से कहा "अगर आग से इतनी दूर खिचड़ी (चावल) पकाया जाए तो कैसे हो सकता है?"

बीरबल ने जवाब दिया "जिस तरह से गरीब आदमी को एक स्ट्रीट लैंप से गर्मी मिली थी, जो एक फर्लांग से ज्यादा दूर था।"

राजा ने अपनी गलती समझी और गरीब आदमी को उसका इनाम दिया।