अफलातून की सीख

अफलातून की सीख

अफलातून की सीख




यूनानी दार्शनिक अफलातून (Aflatoon ) के पास हर दिन कई विद्वानों का जमावड़ा लगा रहता था । सभी लोग उनसे कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त करके ही जाया करते थे । लेकिन स्वयं अफलातून (Aflatoon ) खुद को कभी ज्ञानी नहीं मानते थे क्योंकि उनका मानना था कि इन्सान कभी भी ज्ञानी केसे हो सकता है जबकि हमेशा वो सीखता ही रहता है ।

एक दिन उनके एक मित्र ने उनसे कहा कि ” आपके पास दुनियाभर के विद्वान आपसे ज्ञान लेने आते है और वो लोग आपसे बाते करते हुए अपना जीवन धन्य समझते है लेकिन भी आपकी एक बात मुझे आज तक समझ नहीं आई ” इस पर अफलातून बोले तुम्हे किस बात की शंका है जाहिर तो करो जो पता चले ।

मित्र ने कहा आप खुद बड़े विद्वान और ज्ञानी है लेकिन फिर भी मेने देखा है आप हर समय दूसरों से शिक्षा लेने को तत्पर रहते है । वह भी बड़े उत्साह और उमंग के साथ । इस से बड़ी बात है कि आपको साधारण व्यक्ति से भी सीखने में कोई परेशानी नहीं होती आप उस से भी सीखने को तत्पर रहते है । आपको भला सीखने को जरुरत क्या है कंही आप लोगो को खुश करने के लिए तो उनसे सीखने का दिखावा नहीं करते है ?

अफलातून (Aflatoon ) जोर जोर से हंसने लगे तो मित्र ने पूछा ऐसा क्यों तो अफलातून ने जवाब दिया कि इन्सान अपनी पूरी जिन्दगी में भी कुछ पूरा नहीं सीख सकता हमेशा कुछ न कुछ अधूरा ही रहता है और फिर हर इन्सान के पास कुछ न कुछ ऐसा जरूर है जो दूसरों के पास नहीं है । इसलिए हर किसी को हर किसी से सीखते रहना चाहिए । और फिर हर बात और अनुभव किताबों में तो नहीं मिलते क्योंकि बहुत कुछ ऐसा है जो लिखा नहीं गया है जबकि वास्तविकता में रहकर और लोगो से सीखते रहने की आदत आपको पूरा नहीं पूर्णता के करीब जरुर ले जाती है । यही जिन्दगी का सार है ।
संत लल्लेश्वरी की समदर्शिता

संत लल्लेश्वरी की समदर्शिता

  • संत लल्लेश्वरी की समदर्शिता




कश्मीर में लल्लेश्वरी नामक एक संत थी । उनका विवाह बारह वर्ष की अवस्था में हुआ था, किंतु ससुराल में उनके प्रति दुर्व्यवहार होने से उन्होंने घर त्याग दिया और सेदवायु नामक एक संत से दीक्षा ले ली।

भगवद्-भजन में वे इतनी लीन रहने लगीं कि लोक-लज्जा का भी उन्हें ख्याल न रहता। मीरा के समान मतवाली हो वे भजन करती हुई जब सड़क से गुजरतीं, तो लोग उनका उपहास उड़ाते।

एक बार वे भजन करती हुई मंदिर जा रही थीं कि बच्चे उनके पीछे पड़ गए और उन्हें चिढ़ाने लगे। इस पर एक वस्त्र-व्यापारी ने उन्हें डांटा और भगा दिया। वे बच्चे जब भाग गए तो व्यापारी विजयी मुस्कान से लल्लेश्वरी की ओर देखने लगा। उसकी भंगिमा बता रही थीं कि उसने जैसे संत की बड़ी सेवा की है।

लल्लेश्वरी ने व्यापारी की ओर आशीर्वादात्मक मुद्रा में हाथ उठाया। उसने समझा कि संत प्रसन्न हैं, वह संत के पास गया और उनकी वंदना की। लल्लेश्वरी ने व्यापारी से एक कपड़ा मांगा और उसके दो बराबर-बराबर टुकड़े करने को कहा।

व्यापारी द्वारा वैसा करने पर उन टुकड़ों को अपने दोनों कंधों पर डालकर वे आगे बढ़ीं। रास्ते में जब कोई उनका अभिवादन करता या हंसी उड़ाता, तो वे उन टुकड़ों में एक-एक गठान बांधतीं।

मंदिर से लौटने पर उन्होंने वे टुकड़े व्यापारी को वापस करते हुए उनका वजन करने को कहा। वजन करने पर उनका वजन बराबर-बराबर मिला।

तब लल्लेश्वरी बोलीं, 'प्रशंसा या निंदा का हमें बिलकुल ख्याल नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये दोनों एक-दूसरे को संतुलित करती रहती हैं। इसलिए हमें सबको समान दृष्टि से देखना चाहिए और समान भाव से ग्रहण करना चाहिए।'

संत ललेश्वरी अपने (लल, लला, ललारिफा, ललदेवी आदि) नामों से विख्यात हैं। इस कवयित्री को कश्मीरी साहित्य में वही स्थान प्राप्त है जो हिन्दी में कबीर को है।